पानी एक चलता रहता है नदी मेँ, पानी एक रुका रहता है तालाब मेँ, दोनो तो आये थे आसमान से पर ये क्या हुआ, एक तो रहगया थम के, एक पहुंच गया बहते बहते सागर मेँ महासागर मेँ...
कल को देखा, समझ ना पाया। आने वाले कल को समझना है, इसलिये आज से लड़ता हूँ ; अपने आप से लड़ता हूँ । पर ये वक़्त्त कम्बख्त साथ नही देता। मै तो चलना चाहता हूँ ; पर ये हाथ नही देता।
विज्ञान ने साधन इतने दिए है कि मीलों दूरी का फासला भी एक सेकेंड का हो गया है । किसी से बात करना तो क्या हम अब देख भी सकते है । पर ये क्या हुआ हमारे ज्ञान को, हम नजदीक होकर भी दूर होते जा रहे है । ये कैसे फ़ोन है ; ये कैसे ईमेल जो नही पहुंच पाते दिल तक, उन तक जो सदा करीब रहे दूर रहकर भी , जो दूर है करीब रहकर भी ।
साथ था सबका तब भी अकेला था, आज अकेला हूँ तो साथ है जिम्मेदारियों का, जिनके बारे में मैंने कभी नहीं सोचा. आज शून्य पे खड़ा हूं और देख रहा हूं मंजिल तक पहुंचने के कई मील के पत्थर । आज खोने को कुछ नहीं हैं सिर्फ पाना हैं. एक एक कदम अपनी दम पे उठाना हैं ।
व़क्त तो चलता रहता है और हर कदम एक याद का ज़ख़्म छोड जाता हैं, जो ज़िन्दगी के साथ हरियाते है, हम सहलाकर इन्हे कुछ हल्का कर लेते है मन, वरना मन का क्या वो तो चंचल है, चलता रहता है.
व़क्त लगा है बडा होने में, व़क्त लगा बढने में और ये व़क्त फिर खडा है मेरे सामने। मेरा बचपन फिर आया है, पर व़क्त नही है इसे जीने का। इसके लिये अब जीना (सीडी) बनना है, इस व़क्त में वो जीना है, जो मै ना जी सका अपने व़क्त मै।
घर से दूर एक घर की तलाश है । घर नही मिल रहा, दीवारे मिल रही है । बहुत मेंहगीं हैं, लाखों में है मोल इनका। पर पता नही ये कितना अपना होगा, कितना घर होगा, कितना घर से दूर होगा...
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